मिथिलांचल कि अमूल्य धरोहर है तंत्र पेंटिंग

मधुबनी न्यूज़

 

मिथिलांचल में विलुप्त होने के कगार तक पहुंच गई तंत्र पेंटिंग,जानकार बताते हैं कि तंत्र से जुड़े होने के कारण इस विधा के बारे में गलत भ्रांतियां फैलती गईं। जिसके कारण लोग इससे विमुख होते गए। लेकिन अब यह मिथिलांचल की अमूल्य धरोहर में शामिल होगी।

तंत्र पेंटिंग पूजा स्थल पर तंत्र रूप में उकेरी जाती थी वह भी मिथिला पेंटिंग की तरह धीरे.धीरे पेपर पर निखरने लगी। लेकिन तंत्र से जुड़े होने के कारण इस पेंटिंग के प्रति भ्रांतियां फैलनी शुरू हो गई। लोग इससे विमुख होने लगे। इसकी डिमांड घटने लगी। आलम यह है कि यह अब चंद लोगों के हाथों तक जा सिमटी है। पुरानी पीढ़ी के महज दो से तीन लोग ही इसके जानकार बचे हैं। सभी की उम्र भी करीब 70 के पार पहुंच चुकी है। नई पीढ़ी के चार . पांच लोग इस पेंटिंग से जुड़े जरूर हैं पर बाजार नहीं रहने के कारण दूसरा पेशा अपनाने को मजबूर हैं। परंपरागत तंत्र पेंटिंग बनाने के बावजूद ये इस पेंटिंग के गूढ़ रहस्य को नहीं जानते हैं।

हरिनगर गांव था तंत्र पेंटिंग का गढ़

शहर से सटे हरिनगर गांव तंत्र पेंटिंग का केन्द्र था। फिलहाल गांव के कृष्णानंद झा गोलू झा बौआ जी झा तंत्र पेंटिंग करते हैं। कृष्णानंद झा बताते हैं कि तंत्र पेंटिंग को बाजार नहीं मिलने की वजह से कलाकार विमुख होते चले गये।

क्या है तंत्र पेंटिंग की खासियत

तंत्र पेंटिंग में फिलहाल 10 महाविद्या और दशावतार से संबंधित पेंटिंग बनाई जाती है। 10 महाविद्या में शक्ति स्वरूप भगवती के अलग.अलग रूपों को पेपर के ऊपरी भाग में बनाया जाता है। नीचले भागों में संबंधित यंत्र उकेरा जाता है। दशावतार में पहले अवतार रूपों को उकेरा जाता है उनके नीचे संबंधित रूपों के यंत्र बनाए जाते हैं। सभी यंत्रों के अलग मायने और अलग.अलग प्रभाव हैं। यंत्र आरे.तिरछे ज्यामितीय रेखाचित्र खींचकर बनाएं जाते हैं।

 

कैसे विलुप्त हुई तंत्र पेंटिंग

तंत्र पेंटिंग को लोगों ने भूत.प्रेतए डायन.जोगिनए बुरी नजर आदि से बचने का व्यापार बना दिया। यंत्र और तंत्र की मंगलकारी शक्तियों से ज्यादा इसके नकारात्मक पहलुओं का प्रचार.प्रसार हुआ। लोग इससे दूर भागने लगे।

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