यह अशोक पेपर मिल है

दरभंगा न्यूज़

यह अशोक पेपर मिल है। दरभंगा और समस्तीपुर के बीच हायाघाट के रमेश्वर नगर में हाहाकार करता एक खंडहर। दरभंगा महाराज का लगाया आखिरी कारखाना और आजादी के बाद राज्यसभा सांसद के रूप में कामेश्वर सिंह का पहला कारखाना..। यह कारखाना असम और बिहार में एक साथ लगाया गया था। बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्रा. लि. और डॉ कामेश्वहर सिंह का संयुक्त उपक्रम अशोक पेपर मिल का अधिग्रहण जगन्नाथ मिश्रा ने अदभुत कुतर्क के साथ किया। जगन्नाथ मिश्रा ने यह कारखाना निजी प्रबंधन से यह कहते हुए जबरन ले लिया कि आप कारखाने को ठीक से नहीं चला रहे हैं। सरकार पर रोजगार बचाने का दायित्व है इसलिए यह कारखाना अब हम (सरकार) चलायेंगे।



फिर जगन्नाथ मिश्रा के निकम्मेन चमचों ने मिल का प्रबंधन संभाला और योजना के अनुरूप कारखाने को घाटे में बताकर बंद कर दिया। मामला कोर्ट पहुंचा..कोर्ट ने पूछा कारखाना चलाने के लिए लिया था कि बंद करने के लिए..सरकार ने कहा आदमी खोज रहा हूं, जो इस मिल को चला सके….ट्रेन के शौचालय में बैठकर पंजाब जानेवाला बिहारी समाज आज तक यह नहीं पूछा है कि जब चलाने की औकात नहीं थी, तो अधिग्रहण करने की इतनी आपाधापी क्यों थी….
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इधर असम यूनिट चलाने के लिए कई कारोबारी आये लेकिन बिहार यूनिट में हाथ डालनेवाला कोई नहीं..कोर्ट ने कहा असम तभी मिलेगा जब बिहार भी लोगे..आखिरकार धरम गोधा को इस शर्त पर सौंपा गया कि असम और बिहार के दोनों संयत्रों को एक खास समयवधि में चालू किया जायेगा। असम वाले संयंत्र को चालू कर दिया गया, लेकिन दरभंगा को चालू नहीं किये जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त नाराजगी जतायी है।

मिथिला का पिछड़ापन कोई शोध का विषय नहीं है, ऐसे ही नहीं बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन प्रा. लि. कंगाल हो गया, आज वो भी डाबर और पतंजलि होता.. भगवान जगन्नाथ महान हो गये और उनके वैचारिक मित्र उमाधर सिंह ने अपनी पूरी जिंदगी अशोक पेपर मिल को बंद करबाने और खुलवाने का वादा में ही गुजार दी। इस दौरान उन्होंने वो सब पाया जो एक महान नेता को मिलता है। सम्मान, रुतबा और विधायकी। सवाल है मजदूर को क्या मिला। नेता विधानसभा और संसद जाते रहे और मजदूर पंजाब और हरियाणा…



आज यह मिल धरम गोधा के जिम्मे है जो इस मिल की मशीन को बेच कर इसका वजूद मिटाना चाह रहा है। सवाल है अगर अगर दरभंगा के इलाके में कागज कारखाना चलाना घाटे का सौदा है तो इतना तो मानना पडेगा कि कोई ऐसा कारोबारी था, जो आपको रोजगार देने के लिए 1958 से 1975 तक घाटे का सौदा करता रहा…। कारखाना चलाता रहा…..क्योंकि कामेश्वर सिंह असम में निवेश को तभी तैयार हुए जब उस कंपनी की एक यूनिट हायाघाट में लगाने पर शेयरधाक सहमत हुए… कारखाना बंद कर राजनीति नहीं की…आपका नेता नहीं बना…जगन्नाथ की तरह.

सभार कुमुद सिंह।

Source : Darbhanga City

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